देवशयनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और अगले चार महीनों तक चातुर्मास रहता है। इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश और कई मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
अगर आप Devshayani Ekadashi 2026 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत के नियम, कथा और चातुर्मास के महत्व के बारे में जानना चाहते हैं, तो इस लेख में आपको पूरी जानकारी सरल हिंदी में मिलेगी।

देवशयनी एकादशी 2026: तिथि, पूजा का समय और महत्वपूर्ण जानकारी
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पर्व का नाम | देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi 2026) |
| अन्य नाम | हरिशयनी एकादशी, आषाढ़ी एकादशी, पद्मा एकादशी |
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 25 जुलाई 2026 (शनिवार) – सुबह 05:31 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 26 जुलाई 2026 (रविवार) – सुबह 07:13 बजे |
| देवशयनी एकादशी व्रत | 26 जुलाई 2026 (रविवार) |
| व्रत पारण (द्वादशी) | 27 जुलाई 2026 (सोमवार) |
| पारण का समय | सुबह 05:41 बजे से 08:25 बजे तक (स्थानीय सूर्योदय के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है) |
| पूजा का शुभ समय | सुबह ब्रह्म मुहूर्त से दोपहर तक (लगभग सूर्योदय से 12:00 बजे तक) |
| ब्रह्म मुहूर्त | लगभग सुबह 04:15 बजे से 05:00 बजे तक (स्थान के अनुसार बदल सकता है) |
| आराध्य देव | भगवान श्री विष्णु एवं माता लक्ष्मी |
| विशेष महत्व | भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं, चातुर्मास का आरंभ होता है |
| चातुर्मास अवधि | देवशयनी एकादशी से देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी तक लगभग 4 महीने |
| मुख्य मंत्र | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |
नोट: सटीक तिथि और पारण समय हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलते हैं। 2026 के लिए स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।
देवशयनी एकादशी क्या है?

देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इसे हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी और आषाढ़ी एकादशी भी कहा जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। यह समय पूजा-पाठ, दान, जप, तप और आत्मचिंतन के लिए सबसे शुभ माना जाता है।
Devshayani Ekadashi का महत्व
देवशयनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं बल्कि आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत का अवसर है। इस दिन व्रत रखने से माना जाता है कि:
- भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
- जीवन के पापों का क्षय होता है।
- घर में सुख-समृद्धि आती है।
- मन को शांति मिलती है।
- आध्यात्मिक उन्नति होती है।
चातुर्मास क्या होता है?

देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक के चार महीने चातुर्मास कहलाते हैं। इस दौरान:
- विवाह नहीं किए जाते।
- गृह प्रवेश टाला जाता है।
- नए मांगलिक कार्य कम किए जाते हैं।
- साधु-संत एक स्थान पर रहकर साधना करते हैं।
- भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है।
देवशयनी एकादशी पूजा सामग्री
पूजा शुरू करने से पहले यह सामग्री तैयार रखें।
- भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर
- पीले फूल
- तुलसी दल
- पंचामृत
- धूप
- दीपक
- चंदन
- फल
- नारियल
- केले
- मिठाई
- पीला वस्त्र
देवशयनी एकादशी पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।
- घर के मंदिर की सफाई करें।
- भगवान विष्णु को पीले वस्त्र अर्पित करें।
- दीपक जलाएं।
- तुलसी दल अर्पित करें।
- विष्णु सहस्रनाम या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
- एकादशी व्रत कथा पढ़ें।
- आरती करें।
- जरूरतमंद लोगों को दान दें।
व्रत के दौरान क्या करें?
- भगवान विष्णु का ध्यान करें।
- अधिक से अधिक नाम जप करें।
- सात्विक भोजन करें।
- गरीबों की सहायता करें।
- तुलसी की पूजा करें।
- धार्मिक पुस्तकें पढ़ें।
देवशयनी एकादशी व्रत कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय सूर्यवंशी राजा मान्धाता अपने राज्य पर शासन करते थे। वे धर्मपरायण, न्यायप्रिय और प्रजा का कल्याण करने वाले राजा थे। उनके राज्य में सभी लोग सुखी थे और समय पर वर्षा होती थी।
एक वर्ष ऐसा आया जब राज्य में लगातार तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। खेत सूख गए, नदियाँ और तालाब खाली हो गए, पशु-पक्षी और लोग भोजन व पानी के लिए परेशान होने लगे। पूरे राज्य में अकाल पड़ गया।
प्रजा अपनी समस्या लेकर राजा मान्धाता के पास पहुँची और समाधान की प्रार्थना की। प्रजा का दुख देखकर राजा स्वयं चिंतित हो गए। उन्होंने राज्य के विद्वानों और ऋषि-मुनियों से उपाय पूछा।
राजा वन में जाकर महान तपस्वी महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचे और उनसे अकाल दूर करने का उपाय पूछा। महर्षि अंगिरा ने बताया कि सत्ययुग में धर्म का पालन अत्यंत आवश्यक होता है। उन्होंने राजा से कहा कि यदि वे आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत श्रद्धा और विधि-विधान से करें तथा पूरी प्रजा भी इस व्रत का पालन करे, तो भगवान श्री विष्णु प्रसन्न होंगे और राज्य की सभी कठिनाइयाँ दूर हो जाएँगी।
राजा मान्धाता ने महर्षि की सलाह मानते हुए स्वयं व्रत रखा और पूरे राज्य में देवशयनी एकादशी का व्रत, भगवान विष्णु की पूजा, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य कराया।
भगवान श्री विष्णु उनकी भक्ति और श्रद्धा से प्रसन्न हुए। शीघ्र ही राज्य में अच्छी वर्षा हुई, खेत फिर से लहलहाने लगे, अन्न की भरपूर पैदावार हुई और प्रजा का जीवन फिर से सुखमय हो गया।
इसी दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास की शुरुआत होती है, जो अगले चार महीनों तक चलता है। इस अवधि में भगवान विष्णु की विशेष पूजा, जप, तप, दान और सत्संग का विशेष महत्व माना जाता है।
कथा से मिलने वाली सीख
- सच्ची श्रद्धा और भक्ति से भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
- कठिन समय में धैर्य, विश्वास और धर्म का पालन करना चाहिए।
- व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म की पवित्रता का भी प्रतीक है।
- दान, सेवा और भगवान विष्णु की आराधना से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
- देवशयनी एकादशी हमें आध्यात्मिक जीवन अपनाने और अच्छे कर्म करने की प्रेरणा देती है।
क्या नहीं करना चाहिए?
- क्रोध नहीं करें।
- झूठ नहीं बोलें।
- तामसिक भोजन से बचें।
- नशा बिल्कुल न करें।
- किसी का अपमान न करें।
- अनावश्यक विवाद से दूर रहें।
देवशयनी एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?
यदि आप निर्जला व्रत नहीं रख रहे हैं तो फलाहार कर सकते हैं। इन चीजों का सेवन किया जा सकता है:
- फल
- दूध
- दही
- मखाना
- साबूदाना
- सिंघाड़े का आटा
- कुट्टू का आटा
- राजगीरा
- सेंधा नमक
किन चीजों से बचें?
- चावल
- गेहूं
- दालें
- प्याज
- लहसुन
- सामान्य नमक
- मांसाहार
- शराब
देवशयनी एकादशी पर कौन-सा मंत्र बोलें?
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
या
ॐ विष्णवे नमः
इन मंत्रों का 108 बार जाप करना शुभ माना जाता है।
तुलसी पूजा का महत्व
देवशयनी एकादशी पर तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। तुलसी अर्पित करने से पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है।
क्या नौकरी करने वाले लोग भी व्रत रख सकते हैं?
बिल्कुल। यदि पूरा उपवास संभव न हो तो फलाहार रखकर भी श्रद्धापूर्वक व्रत किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण है श्रद्धा और संयम।
Devshayani Ekadashi 2026 से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQs)
Q. देवशयनी एकादशी कब होती है?
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को।
Q. भगवान विष्णु कितने महीने सोते हैं?
चार महीने तक।
Q. चातुर्मास कब शुरू होता है?
देवशयनी एकादशी से।
Q. क्या इस दिन विवाह किए जाते हैं?
नहीं। परंपरा के अनुसार इस दिन से मांगलिक कार्य स्थगित हो जाते हैं।
Q. क्या महिलाएं व्रत रख सकती हैं?
हाँ, श्रद्धा अनुसार सभी रख सकते हैं।
Q. क्या फलाहार मान्य है?
हाँ। स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार किया जा सकता है।
देवशयनी एकादशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मअनुशासन, भक्ति और सकारात्मक जीवन जीने का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण अवसर है। यदि आप पूरे मन से भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, मंत्र जाप और दान-पुण्य करते हैं, तो यह पर्व आध्यात्मिक शांति के साथ जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भी लाता है।
चातुर्मास की शुरुआत होने के कारण Devshayani Ekadashi 2026 का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन किए गए सत्कर्म, सेवा और भगवान विष्णु की आराधना को विशेष फलदायी माना गया है।
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